Monday, November 11, 2019

रंग-बिरंगी कारीगरी के रंग कितने झूठे कितने सच्चे !!!

चीनी मिटटी के बर्तन, पारम्परिक हस्त-कलाओं से सजे परिधान, अनूठी चित्रकलाएँ, लकड़ी, मिटटी, कपड़े और जूट से बने गहने-खिलौने, आकर्षक मूर्तियाँ और रंग-बिरंगे कपड़े पहने, पारम्परिक वाद्य बजाते, लोकगीत गाते-नाचते कलाकार और हाँ पारम्परिक स्वादिष्ट व्यंजन भी। अमूमन हर दस्तकारी, शिल्प या हाट बाज़ार का यही दृश्य होता है।
 

आजकल इन बाज़ारों में रौनक़ भी ख़ूब रहती है। कभी भी किसी भी वक़्त चले जाइए वहाँ हमेशा भीड़ नज़र आएगी। हाँलाकि आजकल बच्चों को मॉल ज़्यादा भाता है फिर भी दोस्तों या माता-पिता के साथ वो यहाँ नज़र आ जाते हैं। ऐसे बाज़ारों में ख़ासकर एलीट क्लास, बुद्धिजीवी, कलाकार और क्रिएटिव लोगों के साथ-साथ हाई सोसाइटी में बिज़नेस करने वाली महिलाएं चाहे वो इंटीरियर डिज़ाइनर हों या फैशन डिज़ाइनर या मेक-ओवर आर्टिस्ट आप यहाँ किसी से भी टकरा सकते हैं। ऐसा नहीं है कि मिडिल या लोअर क्लास वाले लोग यहाँ नहीं आते, आते हैं पर इन बाज़ारों में चीज़ें इतनी महँगी होती हैं कि हमारी क्लास के ज़्यादातर लोग दाम सुनकर ही चुप लगा जाते हैं। कुछ लोग तो एक बार किसी चीज़ का प्राइस जानने के बाद दूसरी बार पूछने की हिम्मत भी नहीं कर पाते, कुछ लोग थोड़े ढीठ होते हैं और मोल-भाव करने की कोशिश कर बैठते हैं पर उनकी ये कोशिश आमतौर पर तब तक कामयाब नहीं होती जब तक कि उस बाज़ार का आख़िरी दिन न हो। शायद मेरी इस बात से बहुत से लोग सहमत होंगे कि ऐसे बाज़ारों में सामान वाक़ई कई गुना महँगा होता है, वही चीज़ आपको किसी लोकल मार्किट में बहुत सस्ती मिल सकती है। हाँ ये कह सकते हैं कि हाट बाज़ारों में देश भर की पारम्परिक कलाएँ एक ही छत के नीचे मिल जाती हैं, आपको ढूँढना नहीं पड़ता और कई तरह की नई वैराइटी आपको ऐसे ही बाज़ारों में मिलेगी लोकल मार्किट में नहीं।


पिछले महीने अक्टूबर में इंडिया गेट पर सरस आजीविका मेले का आयोजन किया गया। वहां किसी भी स्वयं सेवी संस्था से किसी भी तरह का कोई शुल्क नहीं लिया गया। स्टॉल फ़्री, सामान लाने ले जाने का ख़र्च फ़्री। उस पर प्रत्येक ग्रुप से आए दो सदस्यों के रहने, खाने-पीने के लिए प्रतिदिन और प्रति सदस्य के हिसाब से 700 रुपए दिए जाना तय किया गया। बावजूद इसके सामान सस्ता नहीं कहा जा सकता था। इससे पहले इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय कला केंद्र में लगे दस्तकारी हाट में सामान की क़ीमतें आसमान तो क्या गैलेक्सी को छू रही थीं। फिर भी लोग कई बार ये सोच कर सामान ख़रीद लेते हैं कि कोई कलाकार इतनी दूर से आया है उसने इतनी मेहनत से बनाया है तो एक बार ख़रीदा जा सकता है। एक नज़र में ये सही भी लगता है कि ये सभी हस्तकलाएँ हैं जो बहुत मेहनत से तैयार की जाती हैं तो इन लोक कलाकारों को उनका due तो मिलना ही चाहिए। पर यहाँ सवाल उठता है कि क्या ये सभी कलाकार जेनुइन और ज़रुरतमंद हैं ??!! और जो वाक़ई हैं क्या सचमुच उन्हें उनका due मिलता है !!!! ये दोनों सवाल विरोधभासी नज़र आते हैं लेकिन गौर करें तो स्थिति शीशे की तरह साफ़ नज़र आ जाएगी। ये भी सोचने वाली बात है कि दिल्ली हाट समेत सभी क्राफ़्ट बाज़ारों में वही गिने-चुने लोग कैसे और क्यों आ जाते हैं? यानी सबको फेयर चांस नहीं मिलता है, या फिर जो पैसा ख़र्च कर सकता है वही इन बाज़ारों से फ़ायदा उठाता है और उसका कलाकार होना ज़रूरी नहीं है..... हो सकता है वो कलाकारों और बाज़ार को जोड़ने वाली कड़ी हो!!

दिल्ली के ब्लाइंड स्कूल में हर साल दिवाली मेला लगता है। वहाँ बहुत से बाहर के ग्रुप अपना स्टॉल लगाते हैं और एक स्टॉल का 7 दिन का किराया क़रीब एक लाख रुपए होता है। इतना महँगा होने के बावजूद वहाँ स्टॉल बुक कराने के लिए लोग हर जुगत लगाते हैं क्योंकि उससे चौगुनी रक़म उन्हें वापस मिल जाती है। लेकिन ये लाभ आख़िर जाता कहाँ है !!!???  उस सामान को अपनी मेहनत और टैलेंट से बनाने-सँवारने वाले कारीगरों के पास या उस ग्रुप को चलाने वालों की जेबों में ? एक ऐसे ग्रुप को मैं निजी तौर पर जानती हूँ जहाँ तक़रीबन 150 से ज़्यादा लोग काम करते हैं, जिनमें क़रीब 80 महिला आर्टिस्ट हैं। इनमें से ज़्यादातर औरतें निम्न आय वर्ग से आती हैं, कुछ तो बहुत ही मजबूर होती हैं। कम से कम तनख़्वाह में ज़्यादा से ज़्यादा काम लेकर उनकी मजबूरी का भरपूर फ़ायदा उठाया जाता है। ये ग्रुप जो आर्टिस्ट चलाती हैं वो राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित हैं और सरकार द्वारा उनकी संस्था को कई तरह की सुविधाएँ दी जाती हैं मगर उनका लाभ वहाँ काम करने वाले कलाकारों को नहीं मिलता। उस ग्रुप के हर कलाकार को सरकार द्वारा एक आर्टिस्ट कार्ड जारी किया गया है, लेकिन शायद ही किसी आर्टिस्ट ने वो कार्ड देखा हो। उस कार्ड के ज़रिए जो भी फ़ायदे आर्टिस्ट को मिलने चाहिए वो किसी और को मिल रहे हैं। यहाँ तक कि जिन हालात में आर्टिस्ट काम करते हैं वो भी संतोषजनक नहीं है। उमस भरी गर्मियों में भी एक कमरे में एक कूलर में २०-२5 लोग बैठ कर काम करते हैं। तनख़्वाह जिस प्रतिशत में बढ़नी चाहिए कभी नहीं बढ़ती, बल्कि जो भी अधिकारों की माँग करता है उसे काम से निकाल दिया जाता है। क्योंकि अपने देश में न तो बेरोज़गारों की कमी है न ही मजबूर लोगों की। ऐसे लोगों से कम से कम तनख़्वाह पर काम कराया जा सकता है। ये अकेली ऐसी संस्था नहीं है, ऐसे न जाने कितने ग्रुप्स हैं जो पिछले 15-20 सालों में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं। मगर न तो किसी अख़बार को या टीवी चैनल को उनमें रूचि है न ही सरकार को। सरकार का कर्तव्य तो सुविधायें देकर ख़त्म हो गया, ये जानने की क्या ज़रुरत है कि उन सुविधाओं का लाभ सही व्यक्ति को मिल भी रहा है या नहीं !!! या कहें कि रंग-बिरंगी कलाकारी का ये पहलू किसी को दिखाई ही नहीं देता। जो दिखता है या दिखाया जाता है वो उतना ही अधूरा और झूठा है जैसे चाँद देखने के बाद रात के अँधकार को नकार दिया जाए।

Wednesday, October 30, 2019

मुफ़्त मुफ़्त मुफ़्त !!!!!

पिछले कई महीनों से जो पेंच फँसा हुआ था उसका एक सिरा कल निकल ही गया। भाई दूज यानी 29 अक्टूबर 2019 से दिल्ली में महिलाओं को DTC और क्लस्टर बसों में मुफ़्त सफ़र का तोहफ़ा मिल ही गया। और कहा जा रहा है कि जल्दी ही बुज़ुर्गों और विद्यार्थियों को भी इस तरह का तोहफा दिया जा सकता है।
पर क्या सचमुच ये एक तोहफ़ा है !!!???


क़रीब 1 करोड़ की आबादी वाली दिल्ली में क़रीब 31 लाख लोग रोज़ाना डी टी सी और क्लस्टर बसों में सफ़र करते हैं जिनमें लगभग 30 प्रतिशत महिलाएं हैं, और ज़ाहिर है कि वो इस क़दम से ख़ुश होंगी ही। आख़िर फ़्री में कुछ मिले तो किसे बुरा लगता है। ये छूट यूँ तो सभी महिलाओं को दी जा रही है पर महिला यात्रियों की गिनती के लिए गुलाबी टिकट जारी किया जा रहा है ताकि दिल्ली सरकार उतने पैसे का भुगतान डी टी सी को कर सके।उस टिकट के पीछे दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की फोटो के साथ एक सन्देश भी है। लेकिन कुछ सवाल ऐसे हैं जिन पर हमें सोचना चाहिए।

इस योजना को पूरी तरह लागू करने में जो 140 करोड़ रुपए का ख़र्च आ रहा है उसका बोझ किस पर पड़ेगा ???? 
अभी तो इस ख़र्च का वहन दिल्ली सरकार कर रही है पर भविष्य में इसका बोझ आम आदमी की जेब पर नहीं पड़ेगा इसकी क्या गारंटी है !!!

ये एक अच्छा क़दम हो सकता है, मगर इस चुनावी सीज़न में इस योजना के लागू होने पर और टिकट पर मुख्यमंत्री की फ़ोटो और सन्देश देख कर ये एक चुनावी स्टंट ज़्यादा लगता है।

यहाँ सवाल ये भी उठता है कि आख़िर हमें हर चीज़ फ़्री क्यों चाहिए ? 
क्या हम भिखारी हैं, नाकारा हैं, किसी लायक़ नहीं हैं !!! अगर हम काम करते हैं तो अपना ख़र्च भी उठा सकते हैं, फिर फ़्री क्यों ? शायद ऐसा करके सरकारें हमारा ध्यान बढ़ती महँगाई, बेरोज़गारी जैसी मूल समस्याओं से हटाना चाहती हैं। सरकार ही क्यों पूरा बाज़ार अपने उपभोक्ताओं के दिमाग़ से खेल रहा है और हमें एहसास भी नहीं है। आजकल आप देखिये आये दिन चीज़ों पर छूट और ऑफर्स दिए जा रहे हैं खासतौर पर ऑनलाइन शॉपिंग या लेन-देन पर। त्यौहार आने को हों या सीजन बदल रहा हो, हर तरफ़ छूट ही छूट !!!  या सेल सेल सेल !!! के पोस्टर्स और विज्ञापन नज़र आने लगते हैं। 30% 50% 70% ऑफ़ कहीं कहीं तो 100% कैशबैक का वादा भी किया जाता है। इन ऑफर्स का बाक़ायदा लोग इंतज़ार करते हैं। लेकिन कभी सोचा है कि कंपनियों को इससे क्या फ़ायदा होता है? ऐसा तो बिलकुल नहीं है कि उन्हें कोई फ़ायदा नहीं होता होगा, क्योंकि बिना लाभ के तो बिज़नेस नहीं चल सकता। तो क्या हम सचमुच फ़ायदे में रहते हैं या ये सिर्फ़ उस इंसानी फ़ितरत का फ़ायदा उठाने की ऐसी तरक़ीब है जिसमें लुटने वाला लूटने का सुख महसूस करे और ज़्यादा से ज़्यादा ख़रीदारी करे, चाहे उसे उन चीज़ों की ज़रुरत हो या न हो।

अगर हम ख़र्च कर सकते हैं तो फ़्री क्यों ? हमारी इस फ़्री पाने की प्रवृत्ति का फायदा सभी उठाते हैं कम्पनियों से लेकर राजनेता तक। तभी तो चुनावों में बिजली-पानी फ्री करने, बसों और मेट्रो में मुफ़्त सफ़र का लालच दिया जाता है और हम भी उस लालच में आ जाते हैं। बग़ैर ये सोचे-समझे कि इस दुनिया में कुछ भी फ़्री नहीं मिलता, हर चीज़ की एक क़ीमत होती है। भले भी हम सीधे-सीधे उस क़ीमत को अदा नहीं कर रहे हैं पर इनडायरेक्टली हम शायद उससे चौगुनी क़ीमत दे रहे हैं। कभी  टैक्स के रुप में, कभी ज़रुरत से ज़्यादा या बिना ज़रुरत के ख़रीदारी कर के (उन चीज़ों पर भी हम टैक्स देते हैं)।

मेरे ज़हन में कभी-कभी ये सवाल आता है कि बाँटकर खाने वाले, दान देने में विश्वास रखने वाले देश के लोग क्यों, कब, कैसे हाथ फैलाने में, लालच में यक़ीन रखने लगे !!! साथ ही ये ख़याल भी आता है कि जितना ये सरकारें मुफ़्त सहूलियतें देने में वक़्त और पैसा लगाती हैं उतना अगर रोज़गार देने में, बढ़े हुए टैक्स का बोझ कम करने में, और बढ़ती हुई महँगाई को क़ाबू करने में लगातीं तो शायद लोग सस्ते के चक्कर में चीनी उत्पाद ख़रीद कर अपने देश का पैसा बाहर न भेजते और न ही किसी चीज़ के मुफ़्त पाने की लालसा रखते।

मुफ़्त पाना, कम से कम ख़र्च में थोड़ा ज़्यादा पाना किसी को बुरा नहीं लगता। मगर इस तरह के लालच की आदत हमें किस दिशा में ले जा रही है, इस पर गहन सोच-विचार की आवश्यकता है।     

Saturday, October 5, 2019

180 साल पुरानी सवारी

रामलीला के दिन आने पर मैं हमेशा Nostalgic महसूस करने लगती हूँ। आज भी याद है कि सवारी देखकर लौटते ही बाड़े में जाने की तैयारी शुरु हो जाती थी। खाना पैक करके, एक दो पुराने अख़बार, पानी का ग्लास, तश्तरी-चम्मच और हाथ के पंखे थैले में रख लिए जाते थे। मेरी नानी लगभग हर रोज़ शाम होते ही बाड़े में चलने की ऐसी ही तैयारी करती थीं। लीला का मंचन 7-8 बजे से पहले शुरु नहीं होता था पर हम 5 बजे तक वहाँ पहुँच जाते थे, ताकि ऐसी जगह बैठ सकें जहाँ से मंच के किरदारों के चेहरे और भाव-भंगिमाएँ बिलकुल साफ़-साफ़ दिखाई दें और एक-दो कुर्सियों पर क़ब्ज़ा भी जमा सकें। हाँलाकि घर से किसी को नहीं आना होता था, तीन प्राणी तो कुल थे, मैं तो उनके साथ ही जाती थी और मामाजी कभी सीट पर बैठकर रामलीला देखते नहीं थे। ऐसा सिर्फ़ इसलिए किया जाता था कि कोई पास-पड़ोस का जानने वाला मिल जाए तो उसे कोई परेशानी न उठानी पड़े। और सिर्फ़ मेरी नानी नहीं उस समय ज़्यादातर लोग ऐसा ही करते थे। बाड़े में इस तरह जाने का सिलसिला तो बचपन में ही ख़त्म हो गया लेकिन साइकिल मार्किट से शुरु होने वाली सवारी हम बिला नागा देखने जाते थे। कभी चाँदनी चौक से, कभी दरीबा से तो कभी नई सड़क से वो सवारी हम देख ही लिया करते थे। बहुत मज़ा आता था शायद इसलिए कि उस समय हम बच्चे थे पर उस वक़्त बड़े भी उस सवारी का आनंद उतने ही मन से और जोश से खुलकर उठाया करते थे। आज के बड़ों जैसा सोफ़ेस्टीकेशन नहीं होता था न, तब खुलकर हर जज़्बात का इज़हार करने का रिवाज था, चाहे कितनी ही छोटी या कितनी भी बड़ी बात क्यों न हो।

कल अख़बार में पढ़ा कि इस बार सवारी का रास्ता ही बदल गया है क्योंकि चाँदनी चौक की सड़कें खुदी पड़ी हैं। 180 सालों से चली आ रही ये सवारी साइकिल मार्केट से शुरु होकर दरीबा कलाँ, चाँदनी चौक, नई सड़क, चावड़ी बाज़ार होते हुए बड़े बाड़े यानी रामलीला मैदान तक पहुँचती थी और रात में इसी रास्ते वापस आती थी। लोग अपने घर की छतों पर चढ़कर, दुकानों में बैठ कर या फिर सड़क किनारे खड़े होकर सवारी का आनंद उठाते रहे हैं। आज भी वहाँ दुकानदार अनजान बुज़ुर्गों को अपनी दुकान में बैठने को जगह दे देते हैं बिना इस डर के कि कहीं उनका सामान चोरी न हो जाए, ये देखकर वाक़ई अच्छा लगता है कि आज भी कहीं तो ये विश्वास बना हुआ है।

ये वो सवारी है जिसे देखने लोग दूर-दूर से आया करते हैं, ख़ासकर विदेशी पर्यटक तो  दीवाने रहे हैं। एक समय में इसकी काफ़ी सज-धज हुआ करती थी। सवारी निकलने से पहले मशक लेकर कुछ लोग सड़कों पर पानी का छिड़काव करते थे, सड़क के दोनों तरफ़ कीटनाशक का छिड़काव भी किया जाता था। फिर पुलिस वाले घोड़ों पर सवार होकर सवारी की शुरुआत और आख़िर में सुरक्षा करते हुए चलते थे। घोड़ों की टापों से ही सवारी के शुरु होने और ख़त्म होने का पता चल जाता था। एक पानी की प्याऊ भी निकलती थी जो राह चलते या देर से इंतज़ार में खड़े बच्चे-बड़े-बूढ़ों की प्यास बुझाती थी, तब वॉटर-बॉटल्स का चलन जो नहीं था ! इसके बाद दिखाई देते थे सजे-धजे हाथी, लोग ख़ुद या अपने बच्चों से उनकी सूंड में पैसे रखवाते थे, और वो प्रशिक्षित हाथी वही पैसे महावत को दे देते थे। ये खेल बच्चों को जहाँ डराता था वहीं रोमांचित भी करता था। इसके बाद शुरु होता था, झाँकियों का सिलसिला जो उस रोज़ मंच पर होने वाली लीला के मुताबिक़ निकलती थीं। हर डोले से पहले मशहूर बैंड कोई लोकप्रिय या उस दिन के मुताबिक़ उपयुक्त धुन बजाते हुए चलते थे। सबसे ज़्यादा मज़ा आता था रावण की एंट्री पर बड़ी-बड़ी मूछों वाले, ऊँचे-लम्बे क़द और भारी भरकम शरीर वाले रावण को देखते ही शोर मचना शुरु हो जाता था। वो भी अपनी बड़ी-बड़ी लाल-लाल आँखों से ऐसा डराते थे कि कुछ बच्चे तो सच में डर जाते थे। ऐसा ही शोर-शराबा होता था जब वानर सेना और राक्षसों के बीच सड़कों पर झूठ-मूट की लड़ाई होती थी। दरअस्ल सब एक दूसरे को जानने वाले गली-मोहल्ले के बच्चे ही होते थे जो ये पार्ट अदा किया करते थे, इसलिए सब मिलकर लुत्फ़ उठाते थे। इसी बीच अपने लोकल उत्पादों का प्रचार करने के लिए कम्पनियाँ रावण या दूसरे किरदारों से फ्री में अपने उत्पाद भी बँटवा दिया करती थीं।

अब न मशक रही, न प्याऊ, न घोड़े, न हाथी (शायद पशु-प्रेमी भी ख़ुश होंगे) ये सब चलन काफ़ी पहले ही ख़त्म हो गया था। अब तो बस बैंड-बाजे के साथ डोले यानी झाँकियाँ आती हैं। हाँ, आज भी इस सवारी में स्त्री और पुरुष दोनों का किरदार लड़के ही निभाते हैं, लेकिन पहचानना बेहद मुश्किल होता है कि जो सीता बनी है वो दरअस्ल "बना" है। इस बार सवारी देखने वालों का दायरा ज़रुर कम हुआ है पर  इस सवारी का चार्म कम नहीं हुआ। इसका जो मक़ाम था, वो आज भी है और तब तक क़ायम रहेगा जब तक इसे संचालित करने वालों और देखने वालों में जोश क़ायम है। सवारी से पहले और बाद में बड़े-बड़े मुखौटे, तीर-कमान, ग़ुब्बारे और कई तरह के नए-पुराने ज़माने के खिलौने लिए फेरी वाले, मसालेदार पापड़, आइसक्रीम और खाने-पीने की चीजें बेचने वालों की भीड़ उमड़ पड़ती है। उस वक़्त बच्चे अपने माता पिता को धन्नासेठ समझ कर अपनी हर छोटी-बड़ी फ़रमाइश पूरी करने को लेकर अड़ जाना अपना जन्मसिद्ध अधिकार समझने लगते हैं। ये पहले भी होता था, आज भी होता है और हमेशा होगा। बस वक़्त के साथ-साथ बेचने वाले, ख़रीदने वाले और बिकने वाला सामान बदलता रहेगा।

जिन्होंने ये सवारी कभी नहीं देखी है उनसे मैं इतना कहूँगी कि एक बार तो ज़रुर देखिए। थोड़ी भीड़ तो होगी और कोई फ़िक्स टाइम भी नहीं है इसका पर शाम 4 से 6 के बीच अक्सर सवारी निकलती है और इस बार तो ज़्यादा लम्बा रुट भी नहीं है- जामा मस्जिद चावड़ी बाज़ार या हौज़काज़ी से देख सकते हैं। मेरा ख़्याल ज़िंदगी में एक बार तो इसे देखना बनता है।

Sunday, September 22, 2019

DPL- दिल्ली की अपनी लाइब्रेरी

पुस्तकालयों के इस सफ़र में एक अनुभव गज़ब का रहा, वहाँ जाकर मैं ख़ुद हैरत में पड़ गई। अगर आप कभी पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन से गुज़रे हों तो शायद आपकी नज़र दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी पर पड़ी हो, जिसकी इमारत ठीक रेलवे स्टेशन के सामने है। हाल-फ़िलहाल में गए होंगे तो एक साफ़-सुथरी इमारत पर बड़े-बड़े अक्षरों में हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों में लिखा देखा होगा -दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी। लेकिन जो लोग सालों से वहाँ नहीं गए उनके लिए उस इमारत को पहचानना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। अपने स्कूल-कॉलेज के दौर में कभी-कभी मैं पापा के साथ वहाँ जाया करती थी। उन दिनों उस इमारत की हालत बहुत ही ख़स्ता थी, एक पुराना सा बोर्ड लगा हुआ था, जिसे ध्यान से देखने पर ही लाइब्रेरी के बारे में पता चलता था। वर्ना उसके आगे से गुज़रने पर भी ये जानना मुश्किल होता था कि वहाँ कोई लाइब्रेरी है। अंदर भी कोई ख़ास अच्छे हालात नहीं थे, इसीलिए हम सिर्फ़ किताबें इशू कराके लौट आते थे और कई बार तो घर आकर पता चलता था कि उन किताबों की हालत भी अच्छी नहीं थी। कम से कम मेरी याददाश्त में तो उस लाइब्रेरी की यही छवि उभरती है, लेकिन अब उसकी पूरी तरह कायापलट हो चुकी है।


ज़रा सोचिए कि एक सार्वजनिक पुस्तकालय में किताबों के अलावा और क्या-क्या सुविधाएँ मिल सकती हैं !! अगर मैं कहूँ कि जिम, योग-सेंटर, कैफ़े, ऑडिटोरियम तो शायद आपको यक़ीन नहीं होगा, पर दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी में ये सभी सुविधाएं अपने सदस्यों के लिए मुहैया कराई जाती हैं।




इनके अलावा ई-लाइब्रेरी है और बच्चों के लिए एक कोना अलग से। ये सब बातें DPL की सेंट्रल ब्रांच की हैं, जो श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग पर स्थित है। इसके अलावा चार ज़ोन में चार और शाखाएँ हैं और उन चारों की Sub-Branches भी हैं और सब की अपनी-अपनी ख़ासियत है। इन सबके अलावा ओबेरॉय होटल के पास लाल बहादुर शास्त्री मार्ग पर B.R.A. बिल्डिंग में  एक ब्रेल लाइब्रेरी भी है।

1944 में जब भारत आज़ादी पाने के क़रीब ही था तब दिल्ली में एक पब्लिक लाइब्रेरी बनाने पर विचार-विमर्श चल रहा था। उस समय रामकृष्ण डालमिया ने पुस्तकालय की इमारत बनांने के लिए कुछ रक़म अनुदान में दी थी। उसके बाद 1950 में भारत सरकार और UNESCO ने इस प्रोजेक्ट में दिलचस्पी ली और 27 अक्टूबर 1951 को दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी की बाक़ायदा शुरुआत हुई।

पूरे भारत में चार पुस्तकालय ऐसे हैं जिनमें पार्लियामेंट के 1954 के Delivery of  Books and Newspaper एक्ट के तहत हर भारतीय प्रकाशक को अपने प्रकाशन की पुस्तक की एक कॉपी फ्री में उपलब्ध कराना ज़रुरी है। DPL उनमें से एक है इन मायनों में ये एक बड़ी डेपोसिट्री लाइब्रेरी है, जो मोबाइल लाइब्रेरी सेवा भी उपलब्ध कराती है। "घर-घर दस्तक, घर-घर पुस्तक" अभियान के तहत इस लाइब्रेरी की पाँच बसें हैं जो एक हफ्ते में 100 पॉइंट्स को कवर करती हैं, इनमें से 25 जगहों पर ब्रेल पॉइंट्स बनाए गए हैं। 



अगर आप लाइब्रेरी तक नहीं जा सकते तो भी कोई बात नहीं है आप यहाँ के कंट्रोल रुम में फ़ोन करके बहुत ही कम शुल्क पर घर बैठे किताबें मँगा सकते हैं, शर्त इतनी है कि आप इस लाइब्रेरी के सदस्य हों। सदस्य होने पर आप नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी की सुविधा का लाभ भी उठा सकते हैं जिसमें कई राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय डिजिटल पुस्तकालयों को एक ही वेब पोर्टल पर जोड़ा गया है। DPL की ऑफ़िशियल वेबसाइट पर कई ऐसे लिंक आपको मिल जाएँगे जहाँ से आप फ़्री E-Books पढ़ और डाउनलोड कर सकते हैं, और कई ऑनलाइन सुविधाओं का लाभ उठा सकते हैं।

अगर किसी पुरानी ख़बर को खंगालना हो तो भी आप यहाँ जा सकते हैं, क्योंकि यहाँ 1954 से लेकर मौजूदा समय तक के कई मशहूर अख़बारों को संजो कर रखा गया है। इसके अलावा यहाँ के गैज़ेट सेक्शन में ऐसे बहुत से मूल्यवान जर्नल्स हैं जिनमें विधि-निर्माण, नियम और आधिकारिक घोषणाओं के रेकॉर्ड्स हैं। यहाँ दो सभागार भी हैं जहाँ अक्सर बुक रीडिंग सेशंस, स्टोरी टेलिंग सेशंस के अलावा काव्य संगोष्ठी, सेमीनार, पुस्तक लोकार्पण जैसे कार्यक्रम होते रहते हैं, बच्चों की छुट्टियों में तरह तरह की प्रतियोगिताओं और कार्यशालाओं का आयोजन भी किया जाता है।

DPL में बुज़ुर्गों, महिलाओं और दृष्टिहीन व्यक्तियों के लिए एक ख़ास जगह हमेशा आरक्षित रहती है, ताकि उन्हें किसी तरह की परेशानी न उठानी पड़े। और पढ़ने की आदत को बढ़ावा देने के लिए ही बनाया गया है "Chai-Brary" बुक कैफ़े, जहाँ बैठ कर आप अपनी पसंद की किताबें पढ़ने के साथ साथ चाय-कॉफ़ी और स्नैक्स का लुत्फ़ उठा सकते हैं।


दिल्ली पब्लिक लाइब्रेरी
डॉ श्यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग
पुरानी दिल्ली रेलवे स्टेशन के सामने

सदस्यता फ़ीस:- 20 रुपए
समय:- 9:30AM - 6:00 PM

Sunday, September 15, 2019

हिंदी दिवस: कितना सार्थक !!

हिंदी दिवस आया और कुछ सेमिनार्स, लेक्चर्स और कई औपचारिक कार्यक्रमों के साथ संपन्न हो गया। न तो इस दिन किसी ने सोचा और न ही इस दिन के बाद किसी को इस बात की फ़िक्र होगी कि स्कूलों में हिंदी बोलने पर बच्चों को सज़ा क्यों दी जाती है ? अगर आप इसे राजभाषा कहते हैं तो क्यों स्कूलों में हिंदी अनिवार्य विषय नहीं है ? भारत के सभी राज्यों को देखें तो सबमें अपनी-अपनी मातृभाषा के लिए इतना सम्मान है कि उन्हें और कोई भाषा आए न आए, अपनी मातृभाषा ज़रुर आती है। चाहे वो बंगाली हो, मराठी हो, भोजपुरी,तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम या पंजाबी। लेकिन हिन्दी-भाषी लोगों को अपनी ही भाषा बोलते हुए शर्म आती है, शायद इसीलिए ज़्यादातर प्राइवेट स्कूल्स हिंदी बोलने पर सज़ा देने की हिम्मत कर पाते हैं।

कॉर्पोरेट सेक्टर में तो हिंदी बोलने और लिखने वालों को ऐसी नज़रों से देखा जाता है जैसे वो अनपढ़ हों। मीडिया में कमाई का ज़रिया तो हिंदी होती है पर बातचीत से हिंदी एकदम ग़ायब हो जाती है, खासतौर पर आप अगर किसी बड़ी पोस्ट पर हैं तो आप हिंदी कैसे बोल सकते हैं !!! भारत के उच्च और उच्चतम न्यायालयों में भी हिंदी का प्रयोग न के बराबर है। आजकल टीवी के 90 प्रतिशत फ़िल्मी चैनल्स पर अक्सर हिंदी में डब की गई दक्षिण भारतीय फ़िल्में दिखाई देती हैं। कई दक्षिण भारतीय फिल्मकार अपनी फिल्में हिंदी में भी साथ-साथ बना रहे हैं। लेकिन जब हिंदी को देश की भाषा बनाने का प्रस्ताव आता है तो हंगामा हो जाता है। कहा जाता है कि हिंदी उन पर ज़बरदस्ती थोपी जा रही है। अगर हिंदी से इतनी ही दिक्कत है तो क्यों लोग हिंदी सिनेमा में जगह बनाने के लिए तड़पते हैं ?

हम आम बातचीत में या कारोबारी भाषा में भी हिंदी के अलावा उर्दू और इंग्लिश के कितने ही शब्दों का बेझिझक इस्तेमाल कर लेते हैं। लेकिन शायद आपको जानकर हैरानी होगी कि प्रोफेशनली उर्दू लिखते हुए या बोलते हुए हिंदी के शब्दों का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता, हाँ उनकी जगह आप इंग्लिश के शब्दों का प्रयोग कर सकते हैं। यक़ीन नहीं आता तो कोई साप्ताहिक उर्दू पत्रिका उठा के देख लीजिए या भारत के उर्दू चैनल लगा लीजिए, ख़ुद समझ जाएँगे। और तो और रद्दी वाला भी हिंदी के अख़बार कम पैसों में लेता है !

और हम बात करते हैं हिंदी के प्रचार-प्रसार और तरक़्क़ी की !!!

ग़लत हिंदी बोलने पर हमें कोई शर्मिंदगी नहीं होती पर इंग्लिश ज़रा भी ग़लत हो जाए तो हम पानी-पानी हो जाते हैं। और इसके लिए काफ़ी हद तक हम ही ज़िम्मेदार है, जो अँग्रेज़ी ग़लत बोलने पर तुरंत टोक देते हैं लेकिन जब कोई हिंदी ग़लत बोलता या लिखता है तो किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता, बल्कि "चलता है"। आज के बच्चों को तो छोड़िए कितने ही शिक्षकों को ये नहीं पता होता कि हिंदी में किन शब्दों पर बिंदी यानी अनुस्वार लगता है और किन पर चँद्र बिंदु। सुना तो ये भी है कि अब चँद्र बिंदु का चलन ही ख़त्म हो गया है, बिंदु लगाएँ या ग़लत जगह लगाएँ वो "ग़लती" ही नहीं मानी जाती। हिंदी की गिनती और वर्णमाला की हालत तो और भी ख़राब है। पर हम बस हिंदी दिवस पर कोरे भाषण देंगे या उन्हें सुनकर तालियाँ बजाकर अपने कर्तव्य का पालन कर लेंगे। हम लोग आँकड़े देख कर भी बहुत जल्दी ख़ुश हो जाते है, 900 से ज़्यादा हिंदी शब्द ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी (शब्दकोष) में शामिल हो गए- "WOW " !!!!!

हमारे साथ परेशानी ये है कि हम ख़ुद से ज़्यादा दूसरों की स्वीकृति को मान्यता देना पसंद करते हैं। जब दूसरे हमारी भाषा, हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति को तवज्जो देते हैं तो हम अचानक जाग जाते हैं।
क्यों अपनी ही भाषा बोलते लिखते हुए हमारा आत्मविश्वास डगमगा जाता है ?
क्यों शुद्ध हिंदी बोलना अक्सर मज़ाक़ का विषय बन जाता है ?
क्यों हम अपनी भाषा को वो सम्मान नहीं देते जिसकी वो हक़दार है ?

ये ठीक है कि सिर्फ़ हिंदी लिख-पढ़ और बोल कर हिंदुस्तान में सफलता की ऊँचाइयों को छूना मुश्किल है। लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं है कि हम अपनी भाषा का सम्मान करना छोड़ दे। मैंने कहीं पढ़ा था कि जो अपनी भाषा का सम्मान नहीं करता, दुनिया में उसे भी सम्मान नहीं मिलता। और फिर कोई दूसरा तो आकर हमारी सोच हमारे हालात नहीं बदलेगा, ये कोशिश तो हमें ही करनी पड़ेगी। शायद उस दिन हम सही मायनों में हिंदी दिवस का जश्न मना पाएँ !!!  

Saturday, September 14, 2019

किताबें कुछ कहती हैं



किताबें झाँकती हैं बंद अलमारी के शीशों से 
बड़ी हसरत से तकती हैं 
महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं 
-गुलज़ार-
रोज़मर्रा के व्यस्त जीवन में शायद अलमारी के बंद दरवाज़ों को खोलने की फ़ुरसत न मिले, पर समय-समय पर लगने वाले पुस्तक मेले किताबों से मुलाक़ात का एक मौक़ा ज़रुर दे देते हैं। और वहाँ उमड़ी भीड़ को देखकर महसूस ही नहीं होता कि किताबों से जो नाता क़ायम है वो सिर्फ़ देखने-दिखाने तक सीमित है।


11 सितम्बर से एक बार फिर दिल्ली में पुस्तक मेले का आयोजन हुआ, फिर से लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी। कुछ लोग ऐसे भी रहे जिन्हें इसके बारे में कुछ पता नहीं था, पर जिन्हें पता था वो मौक़ा मिलते ही बुक फेयर चले गए और उन्होंने किताबों पर मिलने वाली छूट का जमकर लाभ भी उठाया। "100 रुपए के 3 उपन्यास या किताब" वाली छूट अमूमन अँग्रेज़ी की किताबों पर होती है और ख़रीदने वालों में ऐसे लोगों की सँख्या भी कम नहीं होती जो न तो लेखक के विषय में बहुत ज़्यादा जानते हैं न उस किताब के विषय में, लेकिन छूट का लाभ उठाने के लिए बुक कवर देख कर या किताब के नाम पर सरसरी सी नज़र डाल कर randomly किताबें चुन लेते हैं। अब इनमें से कितनी किताबें वो पढ़ पाते हैं ये कहना ज़रा मुश्किल है।


हाँलाकि इस दफ़ा हिंदी की किताबों के स्टॉल्स भी काफ़ी हैं। NCERT, NBT, साहित्य अकादमी, हिंदी अकादमी, संस्कृत अकादमी के अलावा बहुत से प्रकाशकों ने इस पुस्तक मेले में भाग लिया। सूचना और प्रसारण मंत्रालय के प्रकाशन विभाग की प्रदर्शनी एकदम अलग पवेलियन में है। यहाँ महात्मा गाँधी पर तो अनेक पुस्तकें हैं ही, साथ ही भारत, भारतीय शहर, कला और साहित्य से जुड़ी अनेक महत्वपूर्ण किताबें यहाँ देखने को मिलीं। गुणवत्ता की दृष्टि से मुझे ये पवेलियन सबसे बेहतर लगा।


इस बार का पुस्तक मेला सिर्फ़ हॉल नंबर 7 तक सिमटा हुआ है, उसी में स्टेशनरी फेयर भी लगा है। और सच कहूँ तो किताबों से ज़्यादा भीड़ स्टेशनरी के स्टॉल्स पर नज़र आती है, खासतौर पर अगर आप के साथ छोटे बच्चे हैं तो रंग-बिरंगे पेन, पाउचेस, स्टिकर्स, अलग अलग तरह के रंग, रबर, पेंसिल्स और गिफ़्ट पैक्स सब बच्चे तो बच्चे बड़ों को भी मोह लेते हैं। इसके अलावा यहाँ सोना बेल्ट, स्ट्रेटटनिंग हेयर ब्रश, ट्रैवलिंग आयरन, खट्टी मीठी गोलियाँ, चूर्ण, शेंडेलेयर्स, ब्रास बोतलें भी बिकती नज़र आईं। हाँलाकि बुक फेयर में इन सबके होने की वजह मुझे आज तक कभी समझ नहीं आई।

ख़ैर ! बहुत सी ऐसी बातें हैं जो शायद आपको भी कभी समझ नहीं आती होंगी जैसे मुझे ये समझ नहीं आता कि हिंदी के ज़्यादातर प्रकाशक अपने स्टॉल्स को थोड़ा आकर्षक क्यों नहीं बनाते ? अपने प्रचार पर ज़ोर क्यों नहीं देते ? फिर उनकी ये शिकायत रहती है कि आजकल लोग हिंदी की किताबें नहीं पढ़ते। आज के प्रतियोगिता के युग में अगर ख़ुद को एक दमदार स्थिति में बनाए रखना है, अपनी एक मज़बूत जगह बनानी है, अपना साहित्य लोगों तक पहुँचाना है, तो उसका प्रचार-प्रसार तो करना पड़ेगा वो भी आज के ज़माने के हिसाब से।

मुझे दिल्ली पुस्तक मेले में जाने का बहुत फ़ायदा हुआ, एक ऐसी किताब जिसे मैं काफ़ी समय से ढूँढ रही थी, आज अचानक मिल गई वो भी बिना ढूँढे, इसलिए मेरा जाना तो सफल रहा। अब इंतज़ार है विश्व पुस्तक मेले का जहाँ दुनिया भर का साहित्य एक साथ एक ही जगह पर उपलब्ध होगा।

Tuesday, September 10, 2019

वक़्त के क़दम से क़दम मिलाती- मैत्रेयी कॉलेज की लाइब्रेरी

पिछले दिनों मुझे बताया गया कि अगले एपिसोड के लिए हम मैत्रेयी कॉलेज की लाइब्रेरी शूट करने जाएंगे। ये सुनकर मेरे ज़हन में कुछ सवाल आए कि एक कॉलेज की लाइब्रेरी क्यों ? दिल्ली में तो बहुत से कॉलेज हैं, तो फिर मैत्रेयी कॉलेज ही क्यों ? पर जब मैं वहाँ पहुँची तो महसूस हुआ कि अगर वहाँ न जाती तो बहुत कुछ मिस कर देती। दरअस्ल जिन दिनों मैं कॉलेज में थी उन दिनों या उसके बाद भी मैत्रेयी कॉलेज कभी भी मेरे आकर्षण का केंद्र नहीं रहा था, न ही वो कभी मेरी "PRIORITY" लिस्ट में शामिल रहा। इसलिए वहाँ जाने के लिए मैं बहुत उत्साहित नहीं थी पर जाना तो था, इसलिए 3 सितम्बर को 5 लोगों की टीम वहाँ के लिए निकल पड़ी। हममें से किसी को भी रास्ता पता नहीं था इसलिए रास्ता भटक गए और फिर पहुँचे "गूगल बाबा" की शरण में। उसके बाद कुछ लोगों से पूछते-पाछते हम कॉलेज पहुँचे तो क़रीब सवा चार बज चुके थे। कॉलेज लगभग ख़ाली था, वहाँ कुछेक स्टूडेंट्स के अलावा लाइब्रेरी का स्टाफ मौजूद था, शायद वो हमारा ही इंतज़ार कर रहे थे।



अंदर जाकर हम डॉ प्रदीप राय से मिले जो मैत्रेयी कॉलेज में लाइब्रेरियन हैं। पहले ही काफ़ी देर हो चुकी थी इसलिए उन्हें अपना परिचय देकर हम सीधे काम पर लग गए यानी शूट शुरु कर दिया। डॉ प्रदीप ने उस लाइब्रेरी के बारे में जब बताना शुरु किया तो वक़्त बढ़ता ही गया, हमें समझ नहीं आ रहा था कि हम उन्हें कहाँ रोकें, क्योंकि हमारा सेगमेंट 5 से 7 मिनट तक का ही होता है। ज़्यादा शूट मतलब ज़्यादा एडिटिंग, इसलिए न चाहते हुए भी हमें उन्हें वाइंड-अप का इशारा करना पड़ा। सच कहूँ तो वाक़ई उस लाइब्रेरी के बारे में बताने को बहुत कुछ है। हमारे कॉलेज तकनीकी रुप से बहुत आगे बढ़ गए हैं, अब बहुत सी सुविधाएँ बस एक क्लिक पर मिल जाती हैं। जो आज के दौर में युवा-वर्ग के ज्ञानवर्धन और तरक़्क़ी के लिए वाक़ई बहुत ज़रुरी है।

मैत्रेयी कॉलेज का ये पुस्तकालय सिर्फ़ कॉलेज की छात्राओं और शिक्षकों के लिए ही है, लेकिन शोध करने या किसी ख़ास विषय पर जानकारी लेने के लिए रेफेरेंस के माध्यम से इस पुस्तकालय की सुविधाओं का लाभ दूसरे विद्यार्थी भी उठा सकते हैं। इस पुस्तकालय को मुख्य रुप से तीन भागों में बाँटा गया है:-
Text Books Section, Reference Section और Reading Room Section.

इनके अलावा यहाँ एक बुक बैंक भी है, जहाँ से ग़रीब और ज़रुरतमंद विद्यार्थी किताबें ले सकते हैं। इस लाइब्रेरी में 90,000 से ज़्यादा किताबें हैं। हिंदी इंग्लिश के क़रीब 20 अख़बार और क़रीब 60 जर्नल्स और मैगज़ीन्स विद्यार्थियों को उपलब्ध कराई जाती हैं।


मैत्रेयी कॉलेज की लाइब्रेरी इस मायने में बहुत ख़ास है कि यहाँ दिव्यांगजन की ज़रुरतों को देखते हुए कई सुविधाएं दी गई हैं। यहाँ ग्राउंड फ़्लोर पर एक यूनिट है, जिसमें Lex कैमरा और Jaws टॉकिंग सॉफ्टवेयर और Supernova मैग्नीफायर सॉफ़्टवेयर की मदद से नेत्रहीन और अल्प-दृष्टि वाले विद्यार्थी भी आसानी से किताब पढ़ और समझ सकते हैं। कैमरा के नीचे किताब रख दी जाती है, टॉकिंग सॉफ्टवेयर उसे पढ़ कर सुनाता है और मैग्नीफायर सॉफ्टवेयर शब्दों को बड़ा करके दिखाता है।

शोधार्थियों के लिए भी यहाँ एक कोना अलग से है। ICSSR के तहत एक शोधार्थी थाईलैंड से आई थीं उनकी स्टडी के मुताबिक़ दिल्ली में इंस्टीट्यूशनल रेपोसेट्री सिर्फ़ चार इंस्टीट्यूशंस के पास है और मैत्रेयी कॉलेज दिल्ली में अकेला ऐसा कॉलेज है जिसके पास अपनी एक इंस्टीट्यूशनल रेपोसेट्री है, जिसमें पिछले पैंतीस सालों का सिलेबस संकलित किया गया है।

मैत्रेयी कॉलेज N-List के अंतर्गत रजिस्टर्ड है, इसलिए यहाँ का हर वो विद्यार्थी जिसे कॉलेज की तरफ़ से वैध User Name और पासवर्ड दिया गया है, ई-बुक्स, ई-जर्नल्स और डेटाबेस को एक्सेस कर सकता है। ये कॉलेज "DELNET" का सदस्य भी है जिसके माध्यम से छात्राएँ देश के अन्य पुस्तकालयों के नेटवर्क से जुड़ सकती हैं।  इसका फ़ायदा ये है कि अगर कोई ज़रुरी किताब, जर्नल या लेख कॉलेज की लाइब्रेरी में उपलब्ध नहीं है, तो इस इंटर लाइब्रेरी से उन्हें उपलब्ध कराया जाता है। मैत्रेयी कॉलेज की लाइब्रेरी में बहुत सी दुर्लभ पुस्तकें भी पढ़ने के लिए रखी गई हैं। यहाँ मैंने पंडित जवाहर लाल नेहरु, इंदिरा गाँधी, मोरारजी देसाई जैसी कई मशहूर हस्तियों की स्पीचीस का कलेक्शन भी देखा और बहुत पुराने शब्दकोष और इनसाइक्लोपीडिया भी देखे।




इस पुस्तकालय में और भी बहुत कुछ देखा जिसे शब्दों में बयाँ करना थोड़ा मुश्किल है। वो है यहाँ के सभी कर्मचारियों और सदस्यों का जोश और मेहनत जिसकी वजह से मैत्रेयी कॉलेज की ये लाइब्रेरी वक़्त के क़दम से क़दम मिला कर चल रही है।