Thursday, November 25, 2021

बदलता ट्रेड फेयर (IITF-2021)


बहुत समय के बाद "अपने लिए" कहीं बाहर जाने का मौक़ा मिला तो सोचा इस मौके को गंवाया न जाए इसलिए अपनी दोस्त के साथ चल दिए "इंडिया इंटरनेशनल ट्रेड फेयर" की सैर को। कोरोना की वजह से वैसे भी पिछले ही साल से ऐसा कोई बड़ा इवेंट दिल्ली में नहीं हो रहा था, फिर प्रगति मैदान में बनी नई ईमारत भी देखनी थी। बहुत क्रेज़ तो नहीं था मगर जब घर से निकल पड़े तो मंज़िल पर पहुंचना ही था। पर सच कहूँ तो ऐसा लगा नहीं कि मैं ट्रेड फेयर देखने आई हूँ। कोरोना से पहले कुछ सालों से ही प्रगति मैदान में लगने वाले मेलों का दायरा थोड़ा कम हो गया था क्योंकि एक नई ईमारत बन रही थी, तो इस बार भी कुछ ख़ास नया नहीं लगा। 

जो लोग दिल्ली या उसके आस-पास पले-बढ़े हैं उन्हें याद होगा कि कैसे ट्रेड फेयर का इंतज़ार किसी त्यौहार की तरह किया जाता था। स्कूल-कॉलेज से निकलते ही स्टूडेंट्स प्रगति मैदान का रुख़ कर लेते थे (जो भूल गए हैं उन्हें याद दिला दूँ कि पहले ट्रेड फेयर आम जनता के लिए दोपहर 2 बजे से खुलता था उससे पहले सिर्फ़ बिज़नेस क्लास ही जा सकती थी ) जॉब करने वाले या तो हाफ डे की छुट्टी लेते थे या फिर शनिवार-रविवार का इंतज़ार करते थे। और वीकेंड के इन दो दिनों में वहाँ पैर रखने की जगह नहीं होती थी। टिकट के लिए भी एक लम्बी लाइन लगती थी और प्रवेश करते हुए भी, इसीलिए लोग एंट्री-पास का इंतज़ाम करने की कोशिश करते थे। 

आस-पास के राज्यों से भी लोग अक्सर इन्हीं दो दिनों में यहाँ आते थे। आदमी पर आदमी चढ़ा हो, इतनी भीड़ होती थी। इसके बावजूद पहले से प्लानिंग की जाती थी कि कौन-कौन से पवेलियंस देखे जाने चाहिए। अलग-अलग राज्यों के पवेलियन्स की पारम्परिक साज-सज्जा सभी को लुभाती थी और दिल चाहता था कि सभी को देख लिया जाए।लेकिन एक दिन में तो पूरा ट्रेड फेयर देख पाना नामुमकिन था, इसलिए प्लान करके जाते थे और अगर दोबारा जाने का मौक़ा मिले तो लोग दोबारा भी जाते थे। बहुत से लोग घर से खाना बनाकर ले जाते और एक तरह से वहाँ पिकनिक मनाई जाती। बाद में ये डिस्कशन भी किया जाता कि कौन सा पवेलियन सबसे ख़ूबसूरत था, किसमें सामान सस्ता मिल रहा था, कहाँ का खाना टेस्टी था वगैरह-वग़ैरह। जो लोग पहले ट्रेड फेयर देख आते थे उनसे बाक़ायदा सलाह ली जाती थी कि कौन से गेट से जाना चाहिए, पार्किंग कितनी दूर है, टिकट कहाँ-कहाँ उपलब्ध है।

इसमें कोई शक़ नहीं कि अब सुविधाएँ तो बढ़ी हैं, आपको टिकट के लिए लाइन में नहीं लगना पड़ता। मेट्रो के कारण पार्किंग का बोझ और सड़कों पर जाम लगना कम हुआ है मगर साथ ही साथ फेयर का लुत्फ़ भी घट गया है। दो मंज़िला नई ईमारत ख़ूबसूरत है मगर वो एक क़िस्म के मॉल की तरह है। 



इसमें पारम्परिकता की सिर्फ़ झलक है, जैसे पहले इंटरनेशनल पवेलियन हुआ करता था, समझ लीजिए कुछ-कुछ वैसा ही हर फ्लोर पर देखने को मिलता है, सभी स्टेट्स एक छत के नीचे। 

प्रवेश के साथ ही सरस, गुड लिविंग जैसे कुछ पवेलियन्स उसी तरह हैं जैसे पिछले कुछ सालों से हम देखते आ रहे थे। 



पर अब न वो माहौल है न ही ट्रेड फेयर का वो वातावरण न ही पहले जैसी भीड़। काफ़ी लोग जा रहे हैं मगर पुराना excitement मिसिंग है। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगा।  

Saturday, January 16, 2021

पुरानी दिल्ली का कटरा नील

पुरानी दिल्ली के चाँदनी चौक में तो पुराना शाहजहाँनाबाद फिर से बनाने की कोशिश की जा रही है। पर मैं सोचती हूँ क्या उससे पुरानी दिल्ली की हालत सचमुच बदल जाएगी ??!! क्या वहाँ के गली, कूँचे, कटरे, हवेलियाँ सब की हालत सुधर जाएगी ??!! मुझे तो ऐसा नहीं लगता.........  आख़िर सत्ता बदल जाने से कभी आम जनता की हालत बदली है ! लेकिन जिस तरह पुरानी दिल्ली की कुछ हवेलियों को रेनोवेट करा के उन्हें पर्यटकों के लिए खोल दिया गया है, उससे ऐसा ज़रुर लगता है कि एक दिन पुरानी दिल्ली का पूरा इलाक़ा सिर्फ़ दर्शनीय स्थल में बदल कर रह जाएगा और तब बाक़ी दिल्ली वाले उन्हें देखने जाया करेंगे। क्योंकि अभी तो आलम ये है कि वहाँ कोई घटना घट जाए, तो कोई बड़ा अख़बार भी तुरंत उसे कवर नहीं करता, न ही टीवी चैनल्स उसका कोई लाइव टेलीकास्ट करते हैं। हाँलाकि ये काफ़ी हैरत की बात है, पर भला हो सोशल मीडिया का और उन Youtubers का (जो शायद वहीं के रहने वाले होंगे) जिनकी वजह से लोगों तक वहॉं की ख़बर पहुँच जाती है। 

जिस दिन चाँदनी चौक के बीचों-बीच बना हनुमान मंदिर गिराया गया उसी के अगले दिन चांदनी चौक के कटरा नील में दर्जनों दुकानें जल गईं पर मैंने न तो किसी अख़बार में वो ख़बर पढ़ी, न ही टीवी पर वो न्यूज़ दिखाई गई। शायद इस तरह की ख़बरों से किसी को कोई फ़ायदा नहीं मिलता ! क्योंकि ये ख़बरें TRP नहीं बढ़ातीं।  

कटरा नील  जिसे वहाँ के आम लोग नील का कटरा कहते हैं, आज वहाँ लेडीज सूट और कुर्तियों की होलसेल मार्किट है। लेकिन एक ज़माने में वहाँ नील बनाया और बेचा जाता था इसीलिए इस का नाम पड़ा नील का कटरा। वहाँ की गली घंटेश्वर में प्राचीन घंटेश्वर मंदिर है जो वहाँ काफ़ी मशहूर है। एक ज़माने में यमुना नदी इसके आस-पास बहती थी तो वहाँ एक गली धोबियान भी हुआ करती थी, जहाँ धोबी रहा करते थे। इसी के पीछे है बाग़ दीवार, और सब्ज़ी मंडी के साथ-साथ खोया मंडी भी है। पहले तो दिल्ली के ज़्यादातर मिठाई वाले सुबह-सुबह यहीं से खोया ले जाते थे। अब तो दिल्ली में ज़्यादातर लोग मिठाई से परहेज़ रखते हैं, कुछ डाइबिटीज़ की वजह से तो कुछ डाइटिंग के कारण, खाते भी हैं तो ब्रांडेड शुगर-फ़्री वाली मिठाई। लेकिन सच कहूँ तो, वो जो पहले असली खोए को घर लाकर भूना जाता था, फिर उससे तरह-तरह की मिठाइयाँ बनाई जाती थीं उनकी महक और स्वाद की बात ही कुछ और थी। 

Monday, January 4, 2021

इतिहास को दोहराना या एक और इतिहास को मिटाना !!??

चाँदनी चौक अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब के लिए मशहूर रहा है। यहाँ जितने शौक़ से रामलीला की सवारी निकलती रही है उतनी ही श्रद्धा से  प्रभात फेरी भी निकलती है और ताज़िए भी। कोई और धार्मिक उत्सव हो यहाँ के लोग अक्सर मिल जुल कर मानते रहे हैं। इसकी सदभाव की मिसाल तो खुद वो लम्बी सड़क है जो लाल क़िले से सीधी फ़तेहपुरी जाती है। उस एक रोड पर ही जैन मंदिर से लेकर गौरीशंकर मंदिर फिर गुरुद्वारा, चर्च और आखिर में फ़तेहपुरी मस्जिद सभी धर्मों के आस्था स्थल मिल जाते हैं। लेकिन इनके अलावा भी बहुत से छोटे-बड़े मंदिर-मस्जिद इस पूरे इलाक़े में हैं, जिनकी सभी धर्मों के लोग इज़्ज़त करते हैं और किसी को किसी से कोई परेशानी नहीं होती। 

चाँदनी चौक की इसी रोड पर घंटाघर की तरफ़ जाते हुए नटराज भल्ले वाले की दुकान से ज़रा सा आगे एक छोटा सा हनुमान मंदिर हुआ करता था। 


उस मंदिर को मैंने अपने बचपन से देखा था, मेरी माँ ने भी अपने बचपन से देखा था और मेरी नानी बताया करती थीं कि जब वो चांदनी चौक आईं थीं, तब से उन्होंने भी उस मंदिर को देखा था। इस तरह माने तो वो मंदिर क़रीब  सौ साल पुराना तो ज़रूर रहा होगा। इस मंदिर से जहाँ लोगों की आस्था जुड़ी थी वहीं बाहर से आने वालों के लिए वो एक लैंडमार्क भी था। "था" इसलिए कह रही हूँ क्योंकि अब आप फिर कभी उस मंदिर को नहीं देख पाएंगे। कोर्ट के ऑर्डर से उस मंदिर को गिराने की क़वायद कल यानी 3 जनवरी 2021 को शुरु हो गई थी। कल वहाँ भारी मात्रा में पुलिस बल तैनात था और मोती बाज़ार के सामने वाली उस रोड तक पहुँचने के सभी रास्तों पर बेरिकेटिंग कर दी गई थी। 

कहा जा रहा है कि ये मंदिर शाहजहाँनाबाद प्रोजेक्ट में यानी चांदनी चौक के सौन्दर्यीकरण के काम में बाधा था। हाँलाकि उस मंदिर वाली जगह पर एक पुराना पीपल का पेड़ भी है जो कोर्ट के ही एक और आदेश के मुताबिक़ काटा नहीं जा सकता। बल्कि हर पेड़ के आसपास 7" x  7" का चबूतरा बनाया जाना लाज़मी है और लोगों को यही एतराज़ है की जब इतना बड़ा चबूतरा बनना ही है तो मंदिर को क्यों तोड़ा जा रहा है क्योंकि वो मंदिर भी लगभग इतना ही छोटा था। पर जनता के घोर विरोध के बावजूद वो प्राचीन मंदिर कल तोड़ दिया गया। 

गौरवशाली इतिहास की नक़्ल करने के लिए, उस अतीत दोहराने की नाकाम कोशिश में, अतीत की निशानियों को ढहा देने में कौन सी समझदारी है ये मेरी समझ में नहीं तो आता खासकर जब उनसे किसी की श्रद्धा भी जुड़ी हो। 

Saturday, January 2, 2021

तीस हज़ारी का इतिहास

किसी भी जगह का पुराना शहर वहां की विरासत को सँजोए रहता है। उसी तरह दिल्ली है, हाँलाकि नई दिल्ली को बसे भी ज़माना हो गया है पर पुरानी दिल्ली वो जगह है जहाँ के चप्पे-चप्पे में दिल्ली के गौरवशाली अतीत के निशान दर्ज हैं, वहीं ऐसी जगह भी हैं जो उस विनाश और तबाही की गवाह हैं जिनसे दिल्ली को दो-चार होना पड़ा। दिल्ली वाले तीस हज़ारी नाम से अच्छी तरह वाक़िफ़ हैं, एक तो कोर्ट की वजह से ये नाम पहले से ही मशहूर था, फिर मेट्रो आने के बाद वहाँ बने मेट्रो-स्टेशन की वजह से भी ये नाम जाना-पहचाना हो गया। 


मगर ये नाम पड़ा कैसे ? पुराने ज़माने में जगहों के नाम या तो वहाँ रहने वालों की तरफ़ इशारा करते थे या वहाँ की किसी ख़ास निशानी या घटना की तरफ़। लेकिन तीस हज़ारी नाम को लेकर इतिहासकारों के अलग अलग मत हैं। 

दिल्ली के इतिहास पर नज़र डालें तो पता लगता है कि एक ज़माने में वहाँ एक बाग़ हुआ करता था जिसमें तीस हज़ार (शायद सभी या ज़्यादातर नीम के) पेड़ थे। इसी वजह से उसे तीस हज़ारी बाग़ कहा जाता था। जहाँ आज सेंट स्टीफेंस हॉस्पिटल है उसके आस-पास तक ये बाग़ फैला हुआ था। दिल्ली से बाहर जाने वाले और बाहर से दिल्ली आने वाले व्यापारी अपने लाव लश्कर के साथ इस बाग़ में डेरा डालते थे। कहते हैं कि वो बाग़ शाहजहाँ की बेटी जहाँआरा ने लगवाया था, जिसे पेड़-पौधों और क़ुदरत से बहुत लगाव था। लेकिन 1857 की क्रांति के बाद अंग्रेज़ों ने इस बाग़ के सभी पेड़ कटवा दिए और बाग़ का नामोनिशान मिटा कर उसे एक मैदान में तब्दील कर दिया। बाग़ ही नहीं बल्कि उस इलाक़े के ज़्यादातर पेड़ इसलिए कटवा दिए गए क्योंकि 1857 की लड़ाई में इन्हीं पेड़ों के पीछे छिपकर हिंदुस्तानी सैनिकों ने ब्रिटिशर्स पर वार किया था। तीस हज़ारी बाग़ के उस मैदान में औरंगज़ेब की बेटी ज़ेबुन्निसा और मोहम्मद शाह की बेगम मलका-उज़-ज़मानी की क़ब्र भी थी, मगर जब दिल्ली में रेलगाड़ी आई तो इसके एक बड़े हिस्से में रेल की पटरियाँ बिछा दी गईं। 

सिख इतिहास में एक कहानी मिलती है सरदार बघेल सिंह के बारे में। ये वही बघेल सिंह हैं जिनके बारे में कहा जाता है कि दिल्ली के प्राचीन गुरुद्वारों की स्थापना उन्होंने ही की थी। ( हाँलाकि हर गुरूद्वारे के नाम की एक अलग कहानी है ) सिख मान्यताओं के अनुसार क़रीब अठारहवीं सदी में सरदार बघेल सिंह अपनी फ़ौज के साथ दिल्ली आए थे लाल क़िले पर चढ़ाई करने। लेकिन तब के बादशाह शाह आलम द्वितीय को इस हमले की ख़बर पहले ही लग चुकी थी तो उसने महीनों की रसद का इंतज़ाम करके क़िले के सारे दरवाज़े बंद कर लिए। तब सरदार बघेल सिंह ने अंदर जाने के लिए दीवार में एक जगह मोहरी / मोरी (hole ) बनाई, इसी से मोरी गेट का नाम पड़ा। और जब वो जीत गए तो जिस जगह पर मिठाई बना कर बाँटी उस जगह को मिठाई का पुल कहा गया। सरदार बघेल सिंह की फ़ौज में तीस हज़ार घुड़सवार थे जो दिल्ली पहुँचने पर इसी तीस हज़ारी बाग़ की जगह पर रुके थे। सिख साहित्य के मुताबिक़ उन तीस हज़ार सैनिकों की वजह से ही उस जगह का नाम तीस हज़ारी पड़ा। हो सकता है ये दोनों बातें सही हों, और ये मात्र संयोग हो कि जिस बाग़ में तीस हज़ार पेड़ थे उसी में तीस हज़ार सिख सैनिक ठहरे। 

इतिहास के बारे में यही बात खटकती है कि जो लिखा गया वो कितना सही था इसका ठीक-ठीक पता नहीं लगाया जा सकता। लेकिन आज वहां न बाग़ है, न क़ब्र, न ही वहां ठहरे सैनिकों के कोई निशान। भीड़-भाड़ वाले इस इलाक़े में मेट्रो स्टेशन है और अदालत का वो परिसर है जिसका उद्घाटन 1958 में हुआ था। हाँ, ख़ास ये आज भी है, एशिया के सबसे बड़े कोर्ट के रूप में। यहाँ  ४०० कोर्ट रुम के अलावा वक़ीलों के ढेर सारे छोटे-छोटे केबिन हैं, आप वहाँ जायेंगे तो वो एरिया किसी छोटी बस्ती की तरह ही दिखेगा। पर उस पुराने वक़्त की कोई यादगार, कोई झलक नहीं मिलेगी, शायद इसी को बीत जाना कहते हैं, शायद इतिहास ऐसे ही बनते हैं!  

Saturday, December 26, 2020

कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर

आख़िरी मुग़ल बादशाह बहादुर शाह ज़फ़र के उस्ताद और दरबार में शायर-ए-ख़ास का दर्जा पाने वाले मशहूर शायर शेख़ इब्राहिम ज़ौक़ ने कहा था - "कौन जाए 'ज़ौक़' पर दिल्ली की गलियाँ छोड़कर" - तब उन्हें कहाँ पता था कि एक दिन आएगा जब उनकी महबूब दिल्ली की तंग गलियां बे-रौनक़ हो जाएँगी। यहाँ बात पुरानी दिल्ली की हो रही है जिसकी साज-सजावट का काम काफ़ी अरसे से चल रहा है। सुना है कि इस बार गणतंत्र दिवस की परेड में उस नई सी दिखने वाली दिल्ली की झाँकी दिखाई जाएगी। जब आप उसे देखेंगे तो सचमुच आपका दिल ख़ुश हो जाएगा मगर हक़ीक़त आप तभी जान पाएंगे जब आप ख़ुद वहाँ गए हों। 


बीच में वहाँ की जो तसवीरें वायरल हुईं उन्हें देखने के कुछ दिनों के बाद मैं भी वहाँ गई मगर हालात पहले से ज़्यादा ख़राब नज़र आए। पान-गुटखे की जो पीक पहले आम सड़कों और दीवारों पर नज़र आती थी वो अब उन लाल पत्थरों के रंग में घुल-मिल गई है। चाट-पकौड़ी के दोने-पत्तलों का कूड़ा भी जगह जगह दिखा। भीड़ भी उतनी ही थी और रिक्शा चलाने वालों की लाइन भी। यूँ भी उस इलाक़े में बदलाव करना इतना आसान नहीं है, जितना इन तस्वीरों में नज़र आता है। इस Beautification की प्रक्रिया में उन लोगों की मुश्किलें बढ़ गई हैं जो दूर-दराज़ से वहां ख़रीदारी करने जाते हैं। मुश्किलें तो वहाँ रहने वालों की भी बढ़ी हैं पर वो तो वहाँ के चप्पे-चप्पे से वाक़िफ़ हैं तो गलियों-गलियों से निकल कर अपना रोज़मर्रा का सफ़र तय कर लेते हैं। या कहें कि उन्हें आदत है उस माहौल में जीने की क्योंकि उन्होंने वहीं आँखें खोलीं, बचपन से उन्हीं तंग गलियों से दोस्ती रही है, उन्हीं हवेलियों में गुज़र-बसर हुई है जहाँ "प्राइवेसी" नाम की कोई चीज़ ही नहीं है। 

पुरानी दिल्ली में रहने वाले ज़्यादातर किरायेदार हैं, पर इतने पुराने कि जिस घर या हवेली के कमरे में वो रह रहे हैं उस पर अब उनका ही अधिकार है। ज़्यादातर के पुरखे यहाँ आए और फिर यहीं के हो गए, कुछेक ने तो उसी एक छोटे से कमरे में अपनी पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी। बाद में कुछ ने वही पुरानी हवेली या कमरा ख़रीद लिया और बदलती पीढ़ी के वो लोग जिन्हें उन तंग गन्दी गलियों में कोई फ्यूचर नज़र नहीं आया ( जो असल में है भी नहीं )  उनमें से कुछ ने पुरानी दिल्ली से कहीं बाहर किसी कॉलोनी में कोई फ़्लैट ख़रीद लिया या मकान बनवा लिया। जो  यहाँ रह रहे हैं या तो मजबूरी में या इसलिए कि उन्हें उस जगह से प्यार है, वहां उनका जन्म हुआ, पढाई-लिखाई हुई, दोस्त बने और बिछड़े, तो एक लगाव होना लाज़मी है, एक इमोशनल अटैचमेंट। वैसे वहाँ रहने वाले पुराने किराएदारों में कुछेक लोग ऐसे भी हैं जो अब वहाँ रहते नहीं हैं लेकिन अपना क़ब्ज़ा भी नहीं छोड़ना चाहते। ताकि जब भी वो हवेली बिके तो उन्हें भी उस कमरे का शेयर मिले जो बाक़ी लोगों को मिलेगा।    

जो लोग पुरानी दिल्ली से निकल गए वो अब वहाँ रहने वालों को 'कुँए का मेढ़क' कहते हैं। मगर वहाँ रहने वालों को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता हाँलाकि अब चांदनी चौक के इलाक़े में अंदर गलियों में भी पूरी मार्किट बन गई है, दुकानें हैं, गोदाम हैं और गंदगी भी बहुत बढ़ गई है। मकान भी काफ़ी पुराने और जर्जर हालत में हैं जो चूहों का परमानेंट ठिकाना बन गए हैं। फिर भी चोरी-चकारी के मामले में वो इलाक़ा आज भी दिल्ली के दूसरे इलाक़ों से ज़्यादा सुरक्षित है, वहाँ से हत्या और आत्महत्या जैसी ख़बरें भी नहीं आतीं। क्योंकि उन हवेलियों में इंसान कभी अकेला ही नहीं होता और सभी पुराने लोग हैं तो एक दूसरे का ख़्याल भी रखते हैं (कभी-कभी ज़बरदस्ती ) और एक दूसरे पर विश्वास भी करते हैं।

हर तरह का सामान दो क़दम की दूरी पर मिल  जाता है, रेलवे स्टेशन भी पास में है, बस अड्डा भी और मेट्रो भी। हॉस्पिटल से लेकर थोक की मार्किट और सबसे बढ़कर खाने-पीने की दुकानें-रेहड़ी जहाँ दिल्ली के बेहतरीन स्वादिष्ट व्यंजन मिलते है। एक ज़माने में चांदनी चौक और फ़तेहपुरी के बीच घंटाघर पर रात के डेढ़ दो बजे भी परांठे और चाय मिल जाती थी। अब तो पता नहीं मिलती है या नहीं .........  मगर हलवा-नगौरी का नाश्ता आज भी सुबह-सुबह मिल जाता है और 10 -15 साल पहले तक ये सिर्फ़ वहीं मिलता था वो भी सिर्फ़ 10 बजे तक, लेकिन बाद में दिल्ली के दूसरे इलाक़ों में भी इस नाश्ते की ख़ुशबू पहुँच गई। 


नटराज के दही-भल्ले, ज्ञानी का फालूदा, दौलत की चाट, लोटन के चटपटे छोले और पराँठे वाली गली के पराँठे.... इस तरह की मशहूर चीज़ों के लिए आज भी लोग वहाँ जाते हैं। हाँलाकि अब वो क्वालिटी नहीं मिलती न ही पहले वाला माहौल है और जिस तरह से हालात बदल रहे हैं अब लोग वहाँ से निकलने की बात सोचने लगे हैं। ख़ासकर नई पीढ़ी जो मल्टीनेशनल कम्पनीज़ में काम करती है, एक क्लिक पर जिसके सामने पूरी दुनिया खुल जाती है, जिसे बहुत ऊँचा उड़ना है। उनकी उस उड़ान के लिए, उनके विशाल पंखों के लिए ये आसमान जो पहले से बहुत तंग था दिन-ब-दिन और तंग होता जा रहा है। 

Saturday, December 19, 2020

"दिल्ली" वो नाम जिसने एक लम्बा सफ़र तय किया

मिर्ज़ा ग़ालिब और दिल्ली का क्या रिश्ता है, इससे तो सभी वाक़िफ़ हैं और दिल्ली से उन्हें कितनी मोहब्बत थी ये इस शेर से ज़ाहिर होता है -

इक रोज़ अपनी रुह से पूछा, कि दिल्ली क्या है ?
तो यूँ जवाब में कह गए,
ये दुनिया मानो जिस्म है और दिल्ली उसकी जान है। 
-मिर्ज़ा ग़ालिब-   

हम जहाँ रहते हैं, या जिन जगहों पर हमने एक अच्छा वक़्त गुज़ारा हो, जिससे काफ़ी यादें जुडी हों, खासतौर पर बचपन की, तो उन जगहों से हमारा एक रिश्ता बन जाता है। मेरा दिल्ली से वही रिश्ता है इसीलिए दिल्ली का नाम सुनते ही एक अपनापन सा महसूस होता है। यूँ तो दिल्ली हमेशा ही चर्चा में रही है पर पिछले काफ़ी वक़्त से ये धरना प्रदर्शनों के कारण काफ़ी लाइमलाइट में है, चाहे वो अन्ना हज़ारे और बाबा रामदेव का प्रदर्शन रहा हो या शाहीन बाग़ का। कभी दिल्ली pollution की वजह से बदनाम होती है तो कभी बलात्कार की घटनाओं से शर्मिंदा होती है। कभी यहाँ बॉम्ब ब्लास्ट होते हैं तो कभी पॉलिटिकल ब्लास्ट। पोलिटिकल ब्लास्ट का तो पूरा एक इतिहास रहा है। कहते हैं कि दिल्ली के सिंहासन पर क़रीब 72 राजाओं ने राज किया है। ये मॉडर्न दिल्ली से पहले की बात है जब दिल्ली, दिल्ली नहीं थी, देहली भी नहीं थी। जो राजा यहाँ आया उसने इसे एक नया नाम दे दिया। 

सबसे पहले यहाँ एक हरा-भरा घना जंगल था जो खाण्डववन या इंद्रवन कहलाता था। चंद्रवंशी राजा सुदर्शन यहाँ आये और उन्होंने जंगल कटवा कर यहाँ एक बहुत सुन्दर नगर बसाया जिसका नाम था - खांडवपुरी। लेकिन वो नगरी जल्दी ही उजड़ गई और फिर से जंगल बन गया। उसके बाद पांडव यहाँ आए और उन्होंने इंद्रप्रस्थ बसाया। इंद्रप्रस्थ से दिल्ली बनने के बीच ये सात बार उजड़ी और बसी। चौहान आये तो क़िला राय पिथौरा नाम का शहर बनाया।  खिलजियों ने बसाया सिरी, तुग़लकों ने तुग़लकाबाद फिर जहाँपनाह और फ़िरोज़ाबाद इसके बाद नाम पड़ा दीनपनाह या शेरगढ़ और फिर शाहजहाँनाबाद जिसे शाहजहाँ ने बसाया। उसके बाद तो अँगरेज़ यहाँ आ ही गए थे। 

वैसे अगर चीज़ें अगर बदलती रहे तो उनकी ताज़गी बरक़रार रहती है और इसी से वो विकास भी कर पाती हैं। लेकिन इस प्रक्रिया में कभी-कभी वो इस क़दर बदल जाती हैं कि उनका असल नाम -पहचान हम भूल ही जाते हैं। जैसे ये कि असल में दिल्ली नाम कहाँ से आया और किसने दिया। इसके बारे में इतिहासकारों के अलग-अलग मत हैं। कुछ कहते हैं कि दिल्ली "दिल" शब्द से बना है जिसका अर्थ है ऊंची जगह या उजड़ी हुई बस्ती। किसी का मानना है कि दिल्ली ऐसी नर्म और पिलपिली जगह को कहते हैं, जहाँ धरती में कील न गाड़ी जा सके। कुछ इतिहासकारों का कहना है कि कन्नौज का एक राजा था जिसका नाम था - दिल्लू, उसके सेनापति ने अपने राजा के नाम पर इस शहर को बनवाया था। वैसे तोमर वंश के समय दिल्ली को ढिल्ली या ढिल्लिका कहा जाता था और उस वक़्त ये हरियाणा का एक नगर था। ये माना जाता है कि प्रसिद्ध शायर और दार्शनिक अमीर ख़ुसरो के समय तक दिल्ली या देहली नाम सुना जाने लगा था। उन का एक शेर है -

"या कि अस्पम बख़्श, या अज़ ख़ोर बिगरमा बारग़ीर 
या बिफ़रमायद कि गरदूँ नशीमन व देहलू रवम।" 
-अमीर ख़ुसरो- 

इसका मतलब है कि या तो मुझे घोड़ा दे या अस्तबल के दरोगा से कह कि मुझे सामान उठाने वाला दे या कि कोई सवारी मिले जिसमें बैठकर मैं देहलू जा सकूँ। 

इंद्रप्रस्थ, खांडवप्रस्थ, ढिल्ली, ढिल्लिका, योगिनीपुरी, किलोखड़ी, नया शहर, देहलू, देहली, DELHI (देल्ही), या दिल्ली। जाने कितने नाम बदले हैं दिल्ली के और आजकल जैसे नाम बदलने का चलन चलन चल पड़ा है, हम बस दुआ ही कर सकते हैं और उम्मीद भी कि कम से कम दिल्ली का नाम न बदले। 

Saturday, December 12, 2020

Seven wonders at one place




अपने सिस्टम पर कुछ ढूंढ रही थी तो अचानक ये पिक्चर्स दिख गईं और याद आया कि ऐसा ही मौसम था जब हमारा पूरा परिवार "वेस्ट टू वंडर" पार्क में गया था बहुत मज़ा आया था। यूँ तो यादें हमेशा दिल में बसी रहती हैं मगर तसवीरें उन बासी हुई यादों को बिलकुल ऐसे ताज़ा कर देती हैं जैसे कल ही की बात हो। क़रीब दो साल पहले अख़बार में पढ़ा था कि दिल्ली में सराय काले ख़ाँ के पास एक ऐसा पार्क बनाया गया है जो वेस्ट मेटीरियल से बना है। वेस्ट मेटीरियल पढ़ कर तो मुझे सबसे पहले चंडीगढ़ का रॉक गार्डन याद आया। फिर पता लगा कि ठीक "वेस्ट टू वंडर" जैसा पार्क राजस्थान के कोटा में भी है, उसी से इंस्पायर होकर दिल्ली में इसे बनाया गया। 

जब मैंने इसके बारे में घर में बताया तो एक दिन मेरी कजिन सिस्टर और हम सब का प्रोग्राम बना कि इस अनोखे पार्क में घूमने जाया जाए। असली अजूबे देखने के लिए तो अलग अलग देशों में जाना पड़ेगा यहाँ तो सब एक साथ दिख जाएंगे, असली न सही रेप्लिकाज़ को देख कर ही संतुष्ट हुआ जाए। तो हम सब भाई बहन बच्चों के साथ पहुँच गए और एंट्री करते ही बच्चे तो बहुत खुश हुए क्योंकि जगह जगह पेड़ों पर लटके हुए बन्दर दिखे तो कहीं पांडा कहीं बेबी टाइगर। सबसे ज़्यादा भीड़ थी उन पानी के झरनों के आस-पास जिन्हें सेल्फ़ी स्पॉट के तौर पर बनाया गया है और ज़ाहिर है वहाँ बच्चे-बड़े सभी मौजूद थे और उतनी भीड़ में सेल्फ़ी लेना तो दूर की बात है खड़ा होना भी मुश्किल हो रहा था। इसलिए हम वहां से आगे बढे और फिर सिलसिला शुरू हुआ दुनिया के सात अजूबों की प्रतिकृतियों का, एक के बाद एक रीयलिस्टिक अनोखी रेप्लिकाज़। आगरा का ताजमहल, गीज़ा के पिरामिड, पेरिस का एफ़िल टावर, पीसा की झुकी हुई मीनार, रियो डी जनेरियो का क्राइस्ट रीडीमर, रोम का कोलोजियम, और न्यूयॉर्क की स्टेच्यू ऑफ़ लिबर्टी। हर अजूबे के पास उसके बारे में विस्तार से बताने वाले सूचना पट्ट भी लगे हैं। 


पूरे पार्क में जगह जगह बेंच बनाये गए हैं ताकि आप थक जाएँ तो वहां बैठ कर थोड़ा सुस्ता लें मगर ऐसा मौक़ा ही नहीं आया, बहुत जल्दी ये सिलसिला ख़त्म हो गया यूँ लगा कि अभी तो आये थे और बस !!! आँखें और भी कुछ देखना चाहती थीं, या हम कुछ ज़्यादा उम्मीद और वक़्त लेकर गए थे, लेकिन आधा घंटा भी नहीं लगा और हमने पूरा पार्क देख लिया। तब तक मेरी कज़िन और उसकी फॅमिली वहाँ नहीं पहुँच पाए थे और वहां अंदर कोई रेस्टोरेंट भी नहीं था जहाँ बैठ कर इंतज़ार करते। आसमान में बादल भी कुछ-कुछ मेहरबान होने लगे थे, और हल्की बारिश ने मूड को और भी फ्रेश कर दिया था लेकिन बच्चों को बीमार नहीं करना था इसलिए बारिश ज़्यादा होती उससे पहले ही हम बाहर निकल गए। उस समय तक थोड़ी-बहुत ही लाइटिंग शुरु हुई थी, लेकिन जब तक मेरी कज़िन वहाँ पहुँची तब तक पूरा पार्क रौशनी से नहा चुका था और उन सोडियम लाइट्स के बीच वो रेप्लिकाज़ एकदम असली लग रही थीं। 




पार्क विजिट करने के बाद मैंने इसके बारे में थोड़ी रिसर्च की और फिर FM गोल्ड के शो "छूमंतर" में इसको कवर भी किया। पता चला कि इस पार्क को बनाने में क़रीब 150 टन कचरे का इस्तेमाल किया गया जिसमें ऑटोमोबाइल कबाढ़, पंखे, छड़ी, लोहे की चादरें, नट-बोल्ट्स, साइकिल, टाइप-राइटर, पुराने बेंच और मोटर साइकिल समेत कई अन्य धातुओं के कचरे को रीसायकल करने के बाद उसका यूज़ यहाँ किया गया पर हैरत की बात ये है कि इतना स्क्रैप यूज़ करने के बावजूद इसे बनाने में क़रीब साढ़े सात करोड़ रूपए का ख़र्च अलग से आया है। पर ये पार्क है पूरी तरह इको फ्रेंडली। यहाँ विंड और सोलर पावर का भी इस्तेमाल किया गया है, जिसके लिए यहाँ सोलर ट्री लगाए गए हैं। कोरोना ख़त्म हो जाए और मौक़ा लगे तो ज़रा घूम आइएगा, फ़ीस बहुत ज़्यादा नहीं है, सुबह 11 बजे से रात 11 बजे तक कभी भी जा सकते हैं। और मुझे लगता है जाएंगे तो ख़ुश होकर ही वापस आएँगे।